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शब्द .... आकाश हो गए - Brossura

रोज़लीन

 
9798902070702: शब्द .... आकाश हो गए

Sinossi

विषमताओं से भरे वातावरण में, जहां साहित्य में भी घोर उदासी, उबासी, थकान, और मानसिक - बौद्धिक भार बढ़ रहा है, वहीं तब अधिकांश लोगों को सुकून -देय साहित्य पढ़ने की आवश्यकता महसूस होने लगती है। ऐसे में पाठक प्रेम, प्रकृति, दर्शन, कल्पना और फैटेंसी से भरी कविता पढ़ना चाहते हैं जो उनके मानसिक - बौद्धिक भार को कुछ कम करके, उन्हें चेतना के स्तर पर अपार शांति दे सके। तब ये तमाम कविताएं ऐसे ही रंगों, भावों, प्राकृतिक मंजुषा , कल्पना, सत्यता, प्रेम और जीवन की असीम संभवानाओं से भरी जीवंत कविताएं हैं, जिन्हें पढ़कर पाठक अलग तरह के सरल-सहज अहसासात से भर उठेंगे। यह संकुचन, सिकुड़न की नहीं - अपितु आजादी से भरी अथाह सुकून की उजास कविताएँ हैं।                            -  रोज़लीन

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